जमदग्निपुत्र राम की एकादश ऋचाएँ

 


       जमदग्निपुत्र राम की एकादश ऋचाएँ
       


हमारी परम्परा में दो राम हुए हैं।  एक हैं दशरथपुत्र 
राम,और दूसरे हैं जमदग्निपुत्र राम। ऋग्वेद के दशम 
मंडल में एक सूक्त मिलता है,जिसके ऋषि जमदग्नि-
पुत्र राम कहे गये हैं। हो सकता है,इस सूक्त के ऋषि 
जमदग्नि ही  हों क्योंकि  सूक्त के शीर्ष पर ऋषि  के 
आगे लिखा है- जमदग्नी रामो वा। जमदग्नि के और 
भी कई  सूक्त  ऋग्वेद में मिलते हैं ,  किन्तु  वहाँ इस 
तरह राम का कोई उल्लेख नहीं । इससे विदित होता 
है,  कि यह सूक्त पूर्णत: या अंशत:  जमदग्निपुत्र का 
है ।  इतना तो निश्चित् है  कि हमें इस सूक्त से पहली 
बार  उस ऋषि का  परिचय  प्राप्त होता है,  जो बाद 
के पौराणिक आख्यानों में  अपने क्रान्तिकारी तेवरों 
से बहुचर्चित हुए । 


🍂
समिद्धो अद्य मनुषो दुरोणे 
देवो देवान्यजसि जातवेद :।
आ च वह मित्रमहश्चिकित्वा-
न्त्वं दूत: कविरसि प्रचेता:।।
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ऋग्वेद 10.110.1.


मनुष्य के भीतर प्रज्वलित ओ अग्नि !
आज तुम हमारे संग्राम में सम्मिलित होओ ।
तुम हमारे सबसे अच्छे मित्र हो ,
तुम दूत बन कर आये हो हमारे पास ,
क्रान्ति का आह्वान करो
और हमें चैतन्य कर दो।।1।।


यह शरीर व्यर्थ ही न ढल जाए ,
सत्य के पुण्यपथ को अलंकृत करो
अपनी वीरता से ,
तुम्हारी जिह्वा में वीररस हो ।
यह देवयज्ञ जो आरम्भ हुआ ,
तुम्हारे कर्मों के तेज से भर जाये।।2।।


तुम्हारे कर्म स्तुत्य हैं , वन्दनीय हैं ।
तुम ही तो हो जो हममें जागे हुए अहर्निश ,
आओ , हमें अपनी भाँति प्रज्वलित करो।
तुम देवों में सर्वोपरि हो,
हमारी प्रार्थनाएँ स्वीकार करो।।3।।


प्राची दिशा में तुम ही
खुले हुए विशाल हृदय हो ।
हमे पृथ्वी पर निवास करने की
पात्रता दो इस प्रभात वेला में ,
तुम्हारी दिव्य आभाएँ
हम मनुष्यों में व्याप्त हो जाएँ ।।4।।


जिस तरह स्त्रियाँ अलंकृत हो कर
आकर्षित कर लेती हैं पुरुष को ,
उसी तरह इन्द्रियाँ ज्योतिर्मय ज्ञान को
आकर्षित करने में समर्थ हों।।5।।


ये दिन और ये रातें
तुमसे आलोकित हों ।
वे सभी दोष नष्ट हो जाएँ
जो जीवन को श्लथ कर देते हैं ।
हमें श्री दो , तेज दो , क्षत्रिय बल दो।।6।।


तुम ही हो वह देव
जो हममें चलते - फिरते हो ,
तुम ही बोलते हो ,
तुम ही करते हो यजन ।
तुम ही हो वह आदिम ज्योति ,
जो प्रत्यक्ष सब दिशाओं में।।7।।


हे भारती !
तू हमारे जीवन यज्ञ में आ।
हम मनुष्यों  में चेतना जगा ,
इडा , सरस्वती और तुम्हारा
हमारे हृदयों में निवास हो।।8।।


इस द्यावापृथ्वी ने
जन्म दिया सब लोकों को ,
यह कितनी मनोरम और अनुपम।
आज और अभी इसके लिये
समर्पण करो ।।9।।


मनुष्यों ! देवताओं के पथ पर चलो ,
वनस्पतियाँ शान्तिकारक हों ,
तुम्हारे भीतर अग्नि प्रज्वलित हो ,
मधु और घृत से सम्पृक्त हो तुम्हारा जीवन ।।10।।


जातक ! शीघ्र यज्ञ आरम्भ करो ,
अग्निशिखाएँ तुम्हें आगे तक ले जाएंगी ।
वाणी में सत्य को बैठाना ,
यज्ञ के प्रसाद से मधुमय हो तुम्हारा जीवन।।11।।


🍁मुरलीधर


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