अलग आर्थिक घेरा बनाकर ही निकलेगा रास्ता

अलग आर्थिक घेरा बनाकर ही निकलेगा रास्ता

-  भरत झुनझुनवाला
कोरोना वायरस के लंबे समय तक टिके रहने में तीन प्रकार की अनिश्चितताएं हैं। पहली यह कि इसके प्रतिरोध के लिए वैक्सीन बन पाती है या नहीं। यदि वैक्सीन बन जाती है तो इसके प्रकोप पर नियंत्रण हो सकता है, या फिर यह दीर्घकाल तक जारी रहेगा। दूसरी अनिश्चितता यह कि यह वायरस गर्मी के मौसम में समाप्त होता है, या छुपा रहता है। यदि छुपा रह जाता है तो आने वाले जाड़े में यह फिर प्रकट हो जाएगा और सभी अर्थव्यवस्थाएं एक बार फिर दबाव में आएंगी। तीसरी अनिश्चितता यह कि आम आदमी इसके प्रति इम्यूनिटी यानी प्रतिरोधक शक्ति हासिल करता है या नहीं। यदि इम्यूनिटी विकसित हो जाती है तो कोरोना का प्रभाव सीमित हो जाएगा। यदि इम्यूनिटी विकसित नहीं हुई तो प्रकोप बार-बार उत्पन्न होगा।

कितनी देर में उबरेंगे
इन अनिश्चितताओं पर ही निर्भर करेगा कि कोरोना का आर्थिक प्रभाव अंग्रेजी के अक्षर U के समान होता है अथवा L के समान। U का अर्थ हुआ कि कुछ समय के लिए प्रभाव हुआ और शीघ्र ही अर्थव्यवस्था पटरी पर आ गई। L का अर्थ हुआ कि वैक्सीन विकसित नहीं हुई, वायरस जाड़े में पुनः प्रकट हुआ और आदमी में इम्यूनिटी विकसित नहीं हुई, जिससे प्रभाव लंबे समय तक खिंचता गया। इस अनिश्चितता से निर्धारित होगा कि कोरोना प्रभाव अल्पकालीन होगा या दीर्घकालीन। अल्पकालीन हो तो भी संकट गहरा है। कारण यह कि 21 दिन के लॉकडाउन में उद्योगों की आय शून्य हो गई है, जबकि उन्होंने बैंकों से जो ऋण ले रखा है उस पर ब्याज चढ़ता जा रहा है। .यदि बैंक इस ब्याज को माफ कर दें तो वह संकट बैंक के ऊपर आएगा क्योंकि बैंक ने आम आदमी से फिक्स्ड डिपॉजिट इत्यादि में रकम जमा ले रखी है, जिस पर ब्याज देना बैंक के लिए जरूरी होगा। यदि सरकार कानून लाकर इस पूरी 21 दिन की अवधि में सभी प्रकार के ब्याज को निरस्त कर दे तो भी संकट बनेगा क्योंकि जो आम आदमी फिक्स्ड डिपॉजिट की आय से ही अपना खर्चा चलाते हैं उनको अपने जमा पर आय नहीं मिलेगी और वे बाजार से कोई सामान नहीं खरीद पाएंगे। ऐसे में बाजार में माल की मांग कम होगी और बड़े उद्योग भी इसकी चपेट में आ जाएंगे।

आने वाले समय में तमाम उद्योगों के दिवालिया होने की आशंका बनती है। यदि कोरोना का संकट लंबा चला तो दिवालिया होने वाली कंपनियों की संख्या निरंतर बढ़ते जाने का अंदेशा है। इस परिस्थिति में तमाम देशों की सरकारों ने वित्तीय घाटा बढ़ा कर अर्थव्यवस्था को संभालने का प्रयास किया है। सरकारें ऋण लेकर अपना खर्च बढ़ा रही हैं। जैसे, रिजर्व बैंक ने मुद्रा छापी और कमर्शल बैंकों को उपलब्ध कराई। कमर्शल बैंकों से भारत सरकार ने ऋण लेकर अपने खर्च बढ़ा दिए। यह रणनीति निवेश के संदर्भ में प्रभावी हो सकती है। मान लीजिए सरकार ने ऋण लेकर हाईवे बनाए, हाईवे पर माल की ढुलाई अधिक होने से सरकार को अतिरिक्त आय हुई, उस आय से सरकार ने लिए गए ऋण की अदायगी कर दी। लेकिन कोरोना के समय जो ऋण लिया जाएगा उससे अतिरिक्त आय नहीं होगी। केवल घाटे की भरपाई होगी।

इस निवेश से सरकार लिए गए ऋण की अदायगी नहीं कर सकेगी। जैसे, सरकार ने कोरोना के समय 100 रुपये का अतिरिक्त ऋण लिया, जिस पर सरकार को 10 रुपये का अतिरिक्त ब्याज अदा करना है। 21 दिनों तक जीएसटी की वसूली नहीं हुई है। मान लें कि सरकार के इस नए निवेश से कुछ आय हो गई तो भी सरकार की कुल आय में वृद्धि नहीं होगी क्योंकि कोरोना के संकट में सरकार की सामान्य आय कम हुई है। इस तरह सरकार पर ब्याज के भार में वृद्धि होगी। उसपर ऋण और ब्याज का भार बढ़ता जाएगा। जैसे, परिवार के सदस्य का अस्पताल में उपचार करने के लिए ऋण लिया जाए तो परिवार की आय नहीं बढ़ती है। अंततः सरकार अपने खर्च में कटौती करने पर मजबूर होगी।
.इसी प्रकार यदि रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दर घटा दी जाए तो भी कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। अमेरिका के फेडरल रिजर्व बैंक ने ब्याज दर शून्य पर ला दी है, फिर भी अर्थव्यवस्था बढ़ नहीं रही है। मांग के अभाव में उद्यमी अथवा उपभोक्ता ऋण लेकर निवेश या खपत करने को तैयार नहीं हैं, इसलिए वित्तीय और मौद्रिक, दोनों नीतियां निष्प्रभावी होंगी। हमें लंबे समय के लिए तैयारी करनी चाहिए। मान कर चलना चाहिए कि कोरोना का प्रभाव L के आकार में होगा।

उपाय यही है कि हम क्षेत्रवार विकास की संभावनाएं बनाएं। जैसे, महाराष्ट्र और केरल में कोरोना का संकट अधिक है, तो उस संकट को महाराष्ट्र और केरल तक सीमित कर दें और ओडिशा के चारों तरफ एक अदृश्य दीवार बनाकर ओडिशा में कोरोना वायरस के प्रवेश पर रोक लगाएं। ओडिशा में राज्य के स्तर पर ही उद्योग लगाकर आर्थिक विकास करें। ओडिशा की जनता को जो माल चाहिए उसका उत्पादन राज्य में ही कर लें। एक प्रकार से यदि हम देश को राज्यों के बीच अलग- अलग अर्थव्यवस्था जैसी शक्ल दे दें और उनके आपसी लेन-देन को कम कर दें, तब एक राज्य से कोरोना का संकट दूसरे राज्य में नहीं फैलेगा।

स्वायत्तता ही समाधान
यही बात अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लागू होती है। यदि इटली, स्पेन और अमेरिका में कोरोना संकट बढ़ गया है तो दूसरे देशों को अपने चारों तरफ अदृश्य दीवार बनाकर इन देशों से लेन-देन को सीमित कर देना चाहिए और अपने क्षेत्र के संसाधनों के आधार पर अपने क्षेत्र में ही स्टील फैक्ट्री, कार फैक्ट्री, फ्रिज फैक्ट्री इत्यादि लगाकर अपनी जरूरतों को पूरा कर लेना चाहिए। हर क्षेत्र की स्वायत्त अर्थव्यवस्था में उत्पादन लागत ज्यादा आएगी, लेकिन इसे स्वीकार करना होगा। फिलहाल हमें जल्दी कोई समाधान हो जाने की उम्मीद छोड़कर लंबे समय के लिए तैयारी करनी चाहिए।


 

 

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