कोरोना की सबसे ज्यादा पीड़ा झेल रहे असहाय मजदूर - शब्दों में बयान नही किया जा सकता मजबूर का दर्द    

कोरोना की सबसे ज्यादा पीड़ा झेल रहे असहाय मजदूर - शब्दों में बयान नही किया जा सकता मजबूर का दर्द     


मोहन वर्मा  देवास   
               कोरोना के बीते दो माहों में इसकी सबसे ज्यादा मार अगर किसी ने झेली है तो उन मजबूर और असहाय मजदूरों  ने झेली है जो रोज कमाने खाने वाले है । बन्द हो गए काम धंधों से जब  से बीबी बच्चों और परिवार का पेट पालने मुश्किल हो गया तो लोग अपनी अपनी जड़ों की और लौट रहे है । कोरोना के नाम पर सड़कों पर वाहन नहीं है,पटरियों पर रेलें नही है । घर गांव पहुंचने का संकट सबसे बड़ा तो है मगर हिम्मत से बड़ा नहीं, शायद इसीलिए किसी सरकार,किसी नेता का मुंह देखने की बजाय हज़ारों लोग पैदल ही सैकड़ों किलोमीटर का सफर तय करने निकल पड़े।  जिसके पास अपने अपने साधन थे, वो साधन से फिर  वो बैलगाड़ी हो,सायकिल हो या मोटर सायकिल । जिसे जो साधन मिला ठीक नहीं मिला ठीक,चल पड़ा ।
          महाराष्ट्र, राजस्थान,गुजरात से चलकर तथा प्रदेश के अन्य स्थानों से हज़ारों लोग, परिवार इन दिनों विस्थापितों की तरह देवास से होकर गुजर रहे है जो प्रदेश के अन्य शहरों से लेकर राजस्थान उत्तरप्रदेश,बिहार दिल्ली या और कहीं भी अपने घरों की और जाते नज़र आ रहे है ।
          इन सबकी कहानी,दर्द,पांवों के छाले शब्दों में बयान करना मुश्किल है । कल बायपास से गुजरी एक बैलगाड़ी का एक बैल रास्ते मे मर जाने के कारण बैल की जगह जुत कर गाड़ी खींचते युवक का दर्द सिर्फ महसूस किया जा सकता है । धारावी मुम्बई से इलाहाबाद के लिए  चले एक परिवार के चार लोगों की हिम्मत तब पस्त दिखाई दी जब परिवार के 45 वर्षीय बड़े भाई ने क्षिप्रा पहुंचते पहुंचते दम तोड़ दिया । छोटे छोटे बच्चों को नंगे पैर धूप में जलते देखकर मन दहलता है ।
             महाराष्ट्र और गुजरात जैसे सक्षम राज्यों के मिट्टी के शेर बने नेता इन असहाय मजदूरों की मदद करने,उन्हें रोकने की जगह सिर्फ बयानबाज़ी करते रहे । यदि उन्हें वहीं मदद मिकती तो कौन हज़ारों किलोंमीटर पैदल परिवार को लेकर निकलता ? 
          मध्यप्रदेश के उन हज़ारों स्वयमसेवी संस्थाओं, नागरिकों की सराहना करनी होगी जो रात दिन इनके लिए अपनी सेवाएं दे रहे है । मानवता का उज्ज्वल चेहरा है जो जगह जगह भोजन पानी विश्राम स्थल की व्यवस्था कर रहा है,फिर सेंधवा हो मानपुर हो महू या इंदौर हो,या देवास ।छोटी छोटी जगहों पर भी लोग खुले दिल से इनकी व्यवस्था में जुटे है । 
            देवास में बायपास पर जगह जगह विभिन्न स्वयमसेवी संस्थाओं के कार्यकर्ता अपने बंधुओं की तीमारदारी में लगे है । ऐसी ही अनेक संस्थाएं नाम और प्रसिद्धि से हटकर शहर के जरूरतमंदों को भी बीते डेढ़ दो माह से लगातार भोजन और राशन की व्यवस्था कर रही है ।
            मुख्यमंत्री के आदेश के बाद प्रदेश के अन्य स्थानों से देवास पहुंचें लोगों को उनके शहरों गॉंवो तक पहुंचाने के लिए आर्गस गॉर्डन से सैकड़ों बसें रोजाना चार हज़ार से अधिक लोगों की सेवा में है जिनमे सवार होकर घर पहुंचने के लिए अलसुबह से देररात तक लोग धूप में कतारों में खड़े नजर आ रहे है । कोरोना की सबसे ज्यादा मार झेल रहे लोगो के दर्द को महसूस कर सेवा कामों में अथक रूप से लोगों को सैल्यूट ।।


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