इंदौर / बाइपास पर घर जाने की दिखी बेकरारी; पैदल, साइकिल, रिक्शा, ट्रकों में सवार हजारों लोगों की बस एक ही इच्छा- किसी तरह अपने गांव पहुंच जाएं

इंदौर / बाइपास पर घर जाने की दिखी बेकरारी; पैदल, साइकिल, रिक्शा, ट्रकों में सवार हजारों लोगों की बस एक ही इच्छा- किसी तरह अपने गांव पहुंच जाएं





इंदौर बाइपास पर श्रमिकों की भीड़ देखने को मिल रही है। घर जाने के लिए इनके हौसले को धूप-गर्मी भी नहीं डिगा पा रही है।






  • कोरोना संक्रमण के चलते यहां ऐसे दृश्य दिखाई दे रहे हैं जैसे- किसी देश का विभाजन हो रहा हो

  • बाइपास पर सेवाभावी लोगों द्वारा घर जा रहे यात्रियों को खाने-पीने की सामग्री दी जा रही है


इंदौर. गरीबी क्या होती है और गरीब होने का क्या मतलब होता है- अगर यह देखना है तो इंदौर बाइपास पर चले जाइए। यहां जाने के बाद आपको जो दृश्य दिखाई देंगे वह इतने मार्मिक होंगे कि आपका दिल पसीज जाएगा कि सरकार द्वारा गरीबों-मजदूरों को उनके घरों तक पहुंचाने के दावों के इतर मजदूरों के माथे की सिकन सच बयां कर रही है। कोरोना संक्रमण के चलते यहां ऐसे दृश्य दिखाई दे रहे हैं जैसे- किसी देश का विभाजन हो रहा हो। यहां से गुजरने वाले पैदल, साइकिल, ऑटो, कार, ट्रकों में सवार हजारों लोगों की बस एक ही इच्छा है कि वह किसी भी तरह से अपने गांव-घर वापस पहुंच जाएं।


कोरोना महामारी के संक्रमण से अब इनका बड़े शहरों से मोहभंग हो चुका है। कई लोगों ने कहा कि वह अपने परिवार की जीवन की गाड़ी चलाने के लिए मुंबई, पुणे, नासिक, अहमदाबाद गए थे  लेकिन, लॉकडाउन के चलते वहां उनका जीवन दूभर हो गया। सरकारों की ओर से कोई व्यवस्था नहीं होने के कारण जो भी साधन मिला उससे अपने घर की ओर चल पड़े। कई लोगों के साथ तो छोटे-छोटे बच्चे भी हैं।


मजदूरों के लिए स्टॉल्स लगाकर राहत पहुंचाने में जुटे इंदौरी


हालांकि, इस मामले में इंदौर ने अपनी दिलदारी दिखाई और इन यात्रियों के लिए बाइपास पर ही खाने-पीने की व्यवस्था की गई है। यहां कई स्टॉल्स लगे हुए हैं जहां घर लौट रहे लोगों को तरबूज, खिचड़ी, पोहे जलेबी, रोटी-सब्जी यहां तक कि पैदल चलने वालों को जूते-चप्पल तक मुहैया करा रहे हैं। इनकी कोशिश यह भी है कि कोई पैदल ना चले। इसके लिए गाड़ियां रोक-रोक कर चालकों से विनती कर इन्हें बैठाया भी जा रहा है। हालांकि, इन्हें भी कोरोना संक्रमण का उतना ही खतरा है लेकिन सेवा-भाव के आगे यह डर कुछ भी नहीं है। जो काम सरकार को करना चाहिए, वह यह सेवाभावी लोग कर रहे हैं।



  • मुंबई से पैदल आ रहे संदीप, मुकेश, आकाश और छोटू मुंबई में गन्ने की चरखी चलाते थे। लॉकडाउन से पूरा काम बंद पड़ गया। 5 दिन से पैदल आ रहे हैं। इंदौर आते-आते चप्पल छन गई। यहां एक संस्था के टेंट में चप्पल मिली। खाना मिल जाता है लेकिन पैसे बगैर कोई लिफ्ट नहीं देता। सारे पैसे खत्म हो चुके हैं और इलाहाबाद जाना है। अकाउंट नंबर देने के बाद भी कोई पैसे नहीं दे रहा और न पुलिस एटीएम तक जाने दे रही।

  • अहमदाबाद में रिक्शा चलाने वाले घनश्याम केवट पत्नी गंगादेवी, 4 बच्चों के साथ रिक्शा चलाते हुए इंदौर पहुंचे। उन्हें मुरैना जाना है। लॉकडाउन के बाद से किराए के मकान में रहते हुए जमा पूंजी खत्म हो रही थी। ऐसी विकट परिस्थिति में कैसे रहते तो सब कुछ छोड़कर सारा सामान रिक्शे में भरकर हमेशा के लिए गांव लौट रहे हैं। अहमदाबाद में अब उन्हें कोई उधार देने वाला भी नहीं बचा है।



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