दर्द-ए-सफर की तीन कहानी / कोई उधार लेकर लॉरी में छिपकर आया तो कोई परिवार संग स्कूटर से हजार किमी के सफर पर निकला, सबने कहा- अब नहीं जाएंगे परदेस

दर्द-ए-सफर की तीन कहानी / कोई उधार लेकर लॉरी में छिपकर आया तो कोई परिवार संग स्कूटर से हजार किमी के सफर पर निकला, सबने कहा- अब नहीं जाएंगे परदेस




  • लॉकडाउन के बीच रोजी रोटी छिनी तो घर पहुंचने की दिखी जद्दोजहद, वाराणसी में हाईवे पर हर तरफ दिख रहे गैर प्रांतों से लौटने वाले मजदूर व उनका परिवार

  • कोई नागपुर से कोई बैंग्लोर से लौटता मिला, हर किसी के पास अपने मुश्किलों भरे सफर के किस्से

  • लोग बोले- जिस पेट को भरने के लिए गए थे अपनों से दूर, अब भूखे पेट वापस होना पड़ा, कम खाएंगे, लेकिन रहेंगे अपने शहर व गांव में


वाराणसी. कोरोना संकट काल को लेकर देशव्यापी लॉकडाउन की सबसे बड़ी मार संगठित व असंगठित क्षेत्र के मजदूरों पर पड़ी है। जिस पेट को भरने के लिए लोग अपनों से कई हजार किमी दूर गए थे, अब उन्हें भूखे पेट ही लौटना पड़ रहा है। कोई पैदल मीलों की दूरी नाप रहा है कुछ किस्मत वाले भी थे, जिन्हें साधन मिल गया। लेकिन सबके पास अपने सफर के अपने किस्से हैं। लेकिन एक बात सबकी जुबां पर है कि, ये संकट कब खत्म होगा कुछ पता नहीं है। अगर शहर में रुकते तो बीमारी से शायद बाद में मरें, भूख से पहले मौत हो जाती। दैनिक भास्कर ने गुरुवार को राजा तालाब हाईवे पर पहुंचे कुछ प्रवासी श्रमिकों से बात की तो तमाम संघर्ष की कहानी सामने आई। तीन श्रमिकों की कहानी उन्हीं की जुबानी...  


17-17 हजार लेकर लॉरी वाले ने बैठाया, इनकी पूरी चेन


एक दुकान के बाहर दो युवक बैठे थे। बात की पता चला कि, वे दोनों दोस्त हैं और चंदौली के रहने वाले हैं। बात आगे बढ़ी तो एक ने अपना नाम संदीप बताया। कहा- वह बेंगलुरु में सिक्योरिटी गार्ड था। 8 हजार तनख्वाह मिल रही थी। उसमें कुछ बचाकर घर भेजता था। सबकुछ ठीक चल रहा था। लेकिन, लॉकडाउन में नौकरी चली गई। कुछ दिन तो राशन का इंतजाम कर दिन बीत गए। लेकिन, उसके बाद लगा कि, यहां और रुके तो भूखे मर जाएंगे। राशन व पैसा खत्म हो चुका था। छह दिन पहले एक एक लॉरी के ड्राइवर से बात हुई।


उसने हमसे 17-17 हजार लेकर बिठाया। यह पैसे उधार लिए गए। यहां से हमारा सफर शुरू हुआ। अगले दिन हम चेन्नई पहुंचे। फिर दूसरी लॉरी में बैठा दिया गया। इसके बाद वहां से हम हैदराबाद आए। फिर लॉरी बदल दिया गया। वहां दूसरी लॉरी से नागपुर फिर इलाहाबाद तक हम आए। वहां से फिर दूसरी गाड़ी पर बिठा दिया गया। तब हम अब बनारस आ गए। यहां से चंदौली पैदल ही जाना है। संदीप ने बताया कि, लॉरी वालों का पूरी एक चेन है। खाद्य सामग्री, सब्जी पहुंचाने का काम करने वाली इन गाड़ियों के ड्राइवर मोटी रकम लेकर श्रमिकों को बैठा लेते हैं। 6 दिनों में सिर्फ नागपुर और प्रयागराज में खाने को मिला था। अब हमें चंदौली तक पैदल ही सफर करना पड़ेगा। थकान व भूख से शरीर भी जवाब दे गया है। 


मौत से जंग कर यहां तक पहुंचे, अब नहीं जाएंगे परदेस


गाजीपुर सैदपुर के रहने वाले छेदी राम 5 दिनों पहले महाराष्ट्र से परिवार के 15 सदस्यों के साथ वाराणासी पहुंचे तो सभी ने राहत की सांस ली। उन्होंने बताया अपनी मैजिक गाड़ी है। वहां बिल्डिंग का काम हम लोग करते थे। स्थिति वहां बहुत खराब है, इसलिए भागना पड़ा। 25 हजार रूपए खर्च हो गया है। गाड़ी में ही महिलाओं, बच्चों के लिए अंदर पटरा लगाकर सोने की व्यवस्था कर दी गयी है। सब समान लेकर हम गांव जा रहे हैं, अब परदेस नहीं लौटेंगे। मैजिक गाड़ी में पूरा परिवार मौत से जंग लड़ते यहां तक पहुंचा है।


स्कूटर व बाइक से बिहार रवाना हुए लोग


हाइवे पर ही तीन और परिवार मिला। ये सभी बच्चों को लेकर नागपुर से तीन पहले रात में स्कूटर, बााइक पर ही सारा सामान लेकर निकले थे। इन्हें बिहार जाना है। कारपेंटर अमित शर्मा ने बताया कि हम तीनों दोस्त परिवार संग नागपुर में काम करते थे। सेठ ने काम से निकाला और कहीं और जाकर रहने के इंतजात करने की बात कही। अजनबी शहर में कुछ सूझ नहीं रहा था। इसलिए हम तीनों अपने परिवार के साथ बाईक, स्कूटर से ही मंगलवार रात निकल पड़े है। भूखों मरने से अच्छा परिवार संग घर पहुंच जाए। पत्नी निशा ने कहा- बच्चा अभी छोटा है। लेकिन निकलना मजबूरी है। अब 2500 रुपए का तेल लगा है।


हाईवे पर जान जोखिम में डालकर घर पहुंचने की जद्दोजहद दिखी


हाइवे पर लागातर श्रमिकों का पैदल आना जारी है। राजातालाब-रोहनिया मार्ग पर लोग ट्रकों में अंदर बैठकर तो कही ट्रकों में 15-15 फिट ऊंचे लदे प्याज और आलू की बोरियों पर बैठकर जाते दिखे। जिंदगी की परवाह किए बगैर लोग बस घर पहुंचने के लिए मौत से जंग लड़ रहे हैं।



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