पर्दे के पीछे / कोरोना कालखंड : सौर मंडल में ग्रहदशा कोरोना संक्रमित पहला मरीज

पर्दे के पीछे / कोरोना कालखंड : सौर मंडल में ग्रहदशा



कोरोना संक्रमित पहला मरीज चीन में गत वर्ष नवंबर में सामने आया था और भारत में जनवरी 2020 में। गौरतलब है कि इस कालखंड के समय सौर मंडल में ग्रहों की दशा क्या थी? किन ग्रहों की युति का समय था? कुरुक्षेत्र के युद्ध में क्या प्रतिदिन बदलती ग्रहदशा से हार-जीत का समीकरण बदल रहा था? कुरुक्षेत्र में अठारवें दिन युद्ध समाप्त हुआ तब की ग्रहदशा जानते हुए यह जानना जरूरी है कि अश्वत्थामा ने द्रौपदी के सोए हुए पुत्रों को मारा तब बुध की दशा क्या थी?


व्यथित द्रौपदी ने अश्वत्थामा को श्राप दिया कि वह कभी मरेगा नहीं। क्या जीना एक श्राप है और मरने पर चैन न आया तो कहां जाएं? कुछ लोग पूर्व जन्म की स्मृति के साथ पैदा होते हैं, जर्मनी के डॉ. वीज ने इस विषय पर शोध किया है। इसे अवतारवाद अवधारणा से भी जोड़ा गया है। एक लेखक ने ‘दशावतार’ नामक पुस्तक में तर्क सम्मत दृष्टिकोण से अवतार अवधारणा पर शोध प्रबंध लिखा है। उनका नाम भूल जाने के लिए शर्मिंदा हूं।
इस्लाम के उदय के समय वहां के बच्चे भी प्रश्न कुंडली बनाकर सही उत्तर देने लगे थे। सेंटर गेब्रिल ने इम्तहान लेने के लिए एक किशोर से प्रश्न पूछा कि इस समय गेब्रिल कहां होंगे? किशोर ने रेत पर अपनी अंगुली से प्रश्न कुंडली बनाई। उसने जवाब यह दिया कि यहां केवल दो व्यक्ति मौजूद हैं और किशोर स्वयं गेब्रिल नहीं है तो प्रश्न पूछने वाला ही सेंटर गेब्रिल हो सकता है। इस्लाम में कुंडली और समय को पढ़ने पर रोक लगा दी गई, क्योंकि उन्हें भय था कि इस क्षेत्र में असली जानकारों का अभाव होगा और कुछ ठग इसे व्यवसाय बनाकर अवाम को लूटेंगे।




सभी अखबार, पत्रिकाओं में साप्ताहिक भविष्यफल दिया जाता है। दीपावली विशेषांक में वार्षिक भविष्यफल प्रकाशित किया जाता है। इस तरह के लेख का हथकंडा यह है कि इस सप्ताह मेष राशि के फल को अगले सप्ताह मकर राशि का भविष्यफल लिख दीजिए। इस तरह के रोटेशन से आप वर्षों अपनी रोजी-रोटी कमा सकते हैं। खाकसार के परिचित ज्वाला प्रसाद शुक्ला, मजदूर यूनियन के कर्मचारी रहे और सेवानिवृत्त होने के बाद ‘पृथ्वी धाराचार्य’ के छद्म नाम से भविष्यफल लिखने लगे।



1 सितंबर 1939 को दूसरा विश्व युद्ध प्रारंभ हुआ था। हिटलर को साढ़े साती लगे एक वर्ष हो चुका था। क्या यह शनि दशा का प्रभाव था कि अति आत्मविश्वास के कारण उसने अपने टैंक के पेन्जर डिवीजन को रोके रखा। उसकी पराजय में इस दुविधा का बड़ा हाथ है। सरलीकरण यह हो सकता है कि सही समय पर अच्छे लोगों से मुलाकात हो जाने को भाग्य कहते हैं। गलत समय पर गलत लोगों के मिलने से बहुत हानि हो सकती है। मध्य प्रदेश के बडनगर में रहने वाले महेश गुप्ता ने डॉक्टर द्विवेदी के शोध प्रबंध पढ़कर यह बात कही कि कुरु क्षेत्र में लड़ा गया युद्ध लगभग पांच हजार वर्ष पूूर्व लड़ा गया था। वह दिन 14 नवंबर मंगलवार था।
ऐसा माना जाता है कि पंजाब में भृगु संहिता में हर मनुष्य की कुंडली विद्यमान है। पंचांग और भृगु संहिता के जानकार लोग कुरुक्षेत्र, दूसरे विश्व युद्ध के दिन और पहर का अध्ययन करके बताएं कि क्या कोरोना कालखंड उसी यथार्थ का तीसरा चरण है? इसे हम प्रलय विवरण से नहीं जोड़ सकते? मलेरिया, हैजा और चेचक महामारी से इसकी तुलना केवल मरने वालों की संख्या तक ही सीमित रहेगी। इस तरह के अध्ययन में उस कालखंड की जनसंख्या को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए और मेडिकल सुविधाओं पर भी विचार करना चाहिए।
सलीम खान और कबूतर
सलीम खान दशकों से सुबह की सैर पर जाते रहे हैं। बांद्रा में उनके निवास स्थान गैलेक्सी से ‘ताज एंड’ होटल तक वे सैर करते रहे हैं। सैर के समय कुछ लोग उनके साथ हो जाते हैं और सैर के साथ मजेदार किस्सागोई भी होती है। दरअसल उनकी किस्सागोई उनकी पटकथाओं की तरह रोचक है। सैर के समय वे कबूतरों को दाना खिलाते हैं। कबूतरों से उनकी मित्रता हो गई। कोरोना के फैलते ही उन्होंने बांद्रा के पुलिल अफसर से अपने लिए एक पास बनवाया।


सैर वे अपने कंपाउंड में भी कर सकते हैं, परंतु उन्होंने कबूतरों को दाना देने के लिए कर्फ्यू पास बनवाया और दाना देकर वे लौट आते थे। कुछ लोगों ने इसे पक्षपात मानते हुए अफसरों से शिकायत कर दी। अत: पुलिस ने उन्हें सैर से रोका, कहा कि यह पास विकट हालात के लिए दिया गया है। कोरोना के विषम कालखंड में मवेशियों और परिंदों को भी दाने नहीं मिल रहे हैं। सड़क के कुत्ते भोजन के अभाव में पगला रहे हैं। परिंदे कभी अपना दुख और असुविधा अभिव्यक्त नहीं करते। ताजा बात यह है कि सलीम खान प्रति दिन कबूतरों के लिए दाने पुलिसकर्मी को देते हैं जो यह काम कर देते हैं।



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