अजीव तत्व जैन दर्शानुसार हेय-उपादेय हैं -----डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन भोपाल

अजीव तत्व जैन दर्शानुसार  हेय-उपादेय  हैं -----डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन भोपाल 


                       जैन दर्शन में सात तत्वों का वर्णन किया गया हैं जैसा की तत्वार्थ सूत्र में बताया गया हैं --
                          जीव अजीव आश्रव ,बंध संवर निर्जरा और मोक्ष .जिसमे ज्ञान दर्शन रूप चेतना पाई जावे उसे जीव कहते हैं .जिसमे चेतना न पाई जावे उसे अजीव कहते हैं .बंध के कारण को आश्रव कहते हैं ,आत्मा के प्रदेशों के साथ कर्मों का दूध -पानी की तरह मिल जाना बंध हैं .आश्रव के रुकने को संवर कहते हैं .आत्मा के प्रदेशों से पहले बंधे हुए कर्मों का एकदेश पृथक होना निर्जरा हैं .समस्त कर्मों के बिलकुल क्षय हो जाने को मोक्ष कहते हैं .
                         अजीवकाया  धर्माधर्माकाश-पुद्गलाः--.धर्म ,अधर्म आकाश और पुद्गल अजीव और कायवान हैं .
                        द्रव्याणि ----उक्त चार पदार्थ द्रव्य हैं .
                        जीवाश्च ----जीव भी द्रव्य हैं 
                       रुपिणः पुद्गलाः ---पुद्गल द्रव्य रुपी अर्थात मूर्तिक हैं .
                     जिन द्रव्यों में चैतन्य नहीं पाया जाता हैं वे अजीव द्रव्य कहे जाते हैं .वे पांच होते हैं .
                1 पुद्गल द्रव्य -----जैन दर्शन में पुद्गल शब्द का प्रयोग बिलकुल अनोखा हैं ,अन्य दर्शनों में इसका प्रयोग नहीं पाया जाता हैं .जो टूटे -फूटे ,बने और बिगड़े वह सब पुद्गलद्रव्य हैं .मोटे तौर पर  हम जो कुछ देखते हैं ,छूते हैं ,सूंघते हैं ,खाते हैं और सुनते हैं वे सब पुद्गल द्रव्य हैं .इसीलिए जैन शास्त्रों में पुद्गल का लक्षण रूप .रस ,गंध ,और स्पर्श वाला बतलाया  हैं .इस तरह पुद्गल से आधुनिक विज्ञानं के मैटर(matter ) और एनर्जी (energy ) दोनों ही संग्रहीत हैं ,जो परमाणु सम्बन्धी आधुनिक खोजों से परिचित हैं वे पुद्गल शब्द की प्रशंसा ही करते हैं .आधुनिक वैज्ञानिकों के मतानुसार सब एटम (परमाणु ) इलेक्ट्रान ,प्रोटोन और न्यूट्रॉन के समूह मात्र हैं .विज्ञान में यूरेनियम एक धातु हैं उससे सदा तीन प्रकार 
 की किरणे निकलती रहती हैं .जब यूरेनियम का एक  अणु तीनों किरणों को खो बैठता हैं तो वह एक रेडियम के अणु के रूप में बदल जाता हैं ,इसी प्रकार रेडियम अणु शीशा धातु में परिवर्तित हो जाता हैं ,यह परिवर्तन बतलाता हैं कि इलेक्टोन और प्रोटोन के विभाग में मैटर का एक रूप दूसरे रूप में परिवर्तित हो जाता हैं .इस रद्दोबदल और टूट फूट को "पुद्गल " शब्द बतलाता हैं . छह द्रव्यों में एक पुद्गल द्रव्य  ही मूर्तिक हैं शेष द्रव्य अमूर्तिक हैं ,
                    न्याय दर्शनकार पृथ्वी ,जल ,वायु ,तेज़ और वायु को जुदा -जुदा  द्रव्य मानते हैं ,क्योकि उनकी मान्यता के अनुसार पृथ्वी में रूप ,रस गंध और स्पर्श चारों गुण पाए जाते हैं .इसी प्रकार जल में गंध के सिवाय तीन ही गुण पाए जाते हैं ,तेज़ में गंध और रस के सिवा शेष दो ही गुण पाए जाते हैं और वायु में केवल स्पर्श गुण ही पाया जाता हैं .अतःचारो के परमाणु जुदे-जुदे हैं .किन्तु जैन दर्शन का कहना हैं कि सब परमाणु एक जातीय ही हैं और उन सभी में चारों गुण पाए जाते हैं .किन्तु उनसे बने  हुए द्रव्यों में जो किसी -किसी गुण कि प्रतीति नहीं होती ,उसका कारण  उन गुणों का अभिव्यक्त न हो सकना ही हैं .
                    पुद्गल के दो भेद हैं ---परमाणु और स्कंध 
                   पुद्गल ---जो स्वयं ही आदि स्वयं ही मध्य और स्वयं ही अंतरूप हैं अर्थात जिसमे आदि ,मध्य और अंत  का भेद नहीं हैं और जो इन्द्रियों के द्वारा भी ग्रहण नहीं किया जा सकता हैं .उस अविभागी द्रव्य को परमाणु जानो .
               सब स्कन्धों का जो खंड हैं अर्थात जिसका दूसरा खंड नहीं हो सकता ,उसे परमाणु जानो ,वह परमाणु नित्य हैं ,शब्द रूप हो सकता हैं ,उसे परमाणु जानो .वह परमाणु नित्य हैं ,शब्द रूप नहीं हैं ,एक प्रदेशी हैं ,अविभागी हैं और मूर्तिक हैं .
                जिसमे एक रस ,एक रूप ,एक गंध और दो स्पर्श गुण होते हैं ,जो शब्द की उतपत्ति में कारण तो हैं किन्तु स्वयं शब्द रूप नहीं हैं और स्कंध से जुदाहैं ,उसे परमाणु जानो .
                 पुद्गल द्रव्य कि अनेक पर्यायें होती हैं ---
               शब्द ,बंध सूक्ष्मता ,स्थूलता ,आकार ,खंड अंधकार ,छाया ,चाँदनी और धुप से सब पुद्गल द्रव्य कि पर्याय हैं .
                    अन्य दार्शनिकों ने शब्द को आकाश का गुण माना जाता हैं ,किन्तु जैन दार्शनिक उसे पुद्गल द्रव्य कि पर्याय मानते हैं .शब्द स्कंध से उतपन्न  होता हैं .अनेक परमाणुओं के बंध विशेष को स्कंध कहते हैं .उन स्कन्धों ने परस्पर में टकराने से शब्दों कि उतपत्ति होती हैं .
                    इन्द्रियों के द्वारा हम जो कुछ देखते हैं सूंघते हैं ,छूते हैं ,चखते हैं और सुनते हैं वे सब पुद्गल द्रव्य की ही पर्याय हैं .
                  २-3 धर्म द्रव्य और अधर्म द्रव्य ---- धर्मद्रव्य और अधर्म द्रव्य से मतलब पुण्य और पाप से नहीं हैं किन्तु  ये दोनों  भी जीव और पुद्गल की ही तरह दो स्वतंत्र द्रव्य हैं जो जीव और पडगालों के चलने और ठहरने में सहायक होते हैं .छह द्रव्यों में से धर्म ,अधर्म ,आकाश और काल ये चार द्रव्य निष्क्रिय हैं ,इनमे हालां चलन नहीं होता ,शेष जीव और पुद्गल ये दो द्रव्य सक्रिय हैं .इन दोनों द्रव्योंको चलने में सहायता करता हैं .वह धर्मद्रव्य हैं और जो ठहरने में सहायता करता हैं वह अधर्मद्रव्य  हैं .यद्यपि चलने और ठहरने की शक्ति तो जीवपुदगल में हैं ही ,किन्तु बाह्य सहायता के बिना उस शक्ति की व्यक्ति नहीं हो सकती.
               धर्मद्रव्य में न रस हैं ,न रूप हैं ,न गंध हैं  न स्पर्श हैं और न वहशब्द रूप ही हैं .तथा समस्त लोक में व्याप्त हैं ,अखंडित हैं और असंख्यात प्रदेशी हैं .जैसे इस लोक में जल मछलियों के चलने में सहायक हैं वैसे ही धर्मद्रव्य जीव और पुद्गलों को चलने में सहायक हैं .
                    जैसा धर्मद्रव्य हैं वैसा ही अधर्मद्रव्य हैं .अधर्मद्रव्य ठहरते हुए जीव और पुद्गल को पृथ्वी की तरह ठहरने में सहायक हैं .सहायक होने पर भी धर्म और अधर्म द्रव्य प्रेरक कारण नहीं हैं अर्थात किसी को बलात नहीं चलाते हैं और न बलात ठहराते हैं .किन्तु चलते हुए को भी चलने में और ठहराते हुए को ठहरने में सहायक मात्र होते हैं .
               4 आकाश द्रव्य ----जो सभी द्रव्यों को स्थान देता हैं उसे आकाश द्रव्य कहते हैं. यह द्रव्य अमूर्तिक और सर्वव्यापी हैं .उसे अन्य दार्शनिक भी मानते हैं .किन्तु जैनों की मान्यता में उनसे कुछ अन्तर हैं .जैन दर्शन में आकाश के दो भेद माने गए हैं --एक लोकाकाश और दूसरा अलोकाकाश .सर्वव्यापी आकाश के मध्य में लोकाकाश हैं और उसे चारों ओर  सर्वव्यापी अलोकाकाश हैं .लोकाकाश में छहों द्रव्य पाए जाते हैं और अलोकाकाश में केवल आकाश द्रव्य ही पाया जाता हैं .
                    जीव ,पुद्गल ,धर्म और अधर्मद्रव्य लोक से बाहर नहीं हैं और आकाश उस लोक के अंदर भी हैं और बाहर भी हैं ,क्योकि उसका अंत नहीं हैं .
                     यदि आकाश अवगाह के साथ साथ गमन और स्थिति का भी कारण हो जायेगा तो ऊर्ध्वगमन करने वाले मुक्त जीव मोक्षस्थान में कैसे ठहर सकेंगे .
                       भगवान जिनेन्द्र ने मुक्त जीवों का स्थान ऊपर लोक के अग्रभाग में बतलाया हैं अतः आकाश गति और स्थिति का निमित्त नहीं .
                      यदि आकाश जीव और पुद्गलों के गमन और स्थिति में भी कारण होता हैं तो ऐसा मानने से लोक की अंतिम मर्यादा बढ़ती हैं और अलोकाकाश की हानि प्राप्त होती हैं ,क्योकि फिर तो जीव और पुद्गल गति करते हुए बढ़ते जायेंगे और जो जो वे आगे बढ़ते जायेंगे त्यों त्यों लोक बढ़ता जायेगा और अलोक घटता जायेगा.
                      जिनवर भगवान् ने श्रोता जनों को लोक का स्वाभाव ऐसा ही बतलाया हैं .अतः धर्म और अधर्म द्रव्य ही गति और स्थिति के कारण हैं ,आकाश नहीं .
                       जैन धर्म लोकाकाश को सांत मानता हैं और उसके आगे अनंत आकाश मानता हैं .प्रसिद्ध वैज्ञानिक आइंस्टीन समस्तलोक को सांत मानते हैं ,किन्तु उसके आगे कुछ नहीं मानते हैं ,क्योकि प्रोफेसर एडिंग्टन का कहना हैं की पदार्थ विज्ञानं का विद्यार्थी  कभी भी आकाश को शून्यवत नहीं मान सकता .
                 5 काल द्रव्य ---जो वस्तु मात्र के परिवर्तन में सहायक हैं उसे कालद्रव्य कहते हैं. यद्यपि परिणमन करनेकी शक्ति सभी पदार्थों में हैं .किन्तु बाह्य निमित्त के बिना उस शक्ति की व्यक्ति नहीं हो सकती हैं .जैसे कुम्हार के चाक में घूमने की शक्ति मौजूद हैं ,किन्तु कील का साहाय्य पाए बिना वह घूम नहीं सकता .वैसे ही संसार के पदार्थ भी काल द्रव्य का सहाय्य पाए बिना परिवर्तन नहीं कर सकते .अतः काल द्रव्य उनके परिवर्तनों में सहायक हैं .किन्तु वह भी वस्तुओं का बलात परिणमन नहीं कराता हैं और न एक द्रव्य का दूसरे द्रव्य रूप परिणमन कराता हैं ,किन्तु स्वयं परिणमन करते हुए द्रव्यों का सहायक मात्र हो जाता हैं .
                     काल दो प्रकार का हैं --एक निश्चयकाल और दूसरा व्यवहारकाल .लोकाकाश के प्रत्येक प्रदेश पर जुदे-जुदे कलानुकाल के अणु स्थित हैं उन कलाणुओं को निश्चयकाल कहते हैं  .अर्थात कालद्रव्य नाम की वस्तु वे कालाणु ही हैं .उन कलाणुओं के निमित्त से ही संसार में प्रतिक्षण परिवर्तन होता रहता हैं उन्ही के निमित्त से प्रत्येक वस्तु का अस्तित्व कायम हैं .आकाश के एक प्रदेश में स्थित पुद्गल का एक परमाणु मंदगति से जितनी देर से उस प्रदेश से लगे हुए दूसरे प्रदेश पर पहुँचता हैं उसे समय कहते हैं .यह समय कालद्रव्य की पर्याय हैं .समयों के समूह को ही आवली ,उच्छ्वास ,प्राण स्तोक,घटिका ,दिन रात आदि कहा जाता हैं .यह सब व्यवहारकाल हैं .यह व्यवहारकाल सौरमंडल की गति और घड़ी वगैरह के द्वारा जाना जाता हैं तथा इसके द्वारा ही निश्चय काल अर्थात काल द्रव्य के अस्तित्व का अनुमान किया जाता हैं ,क्योकि जैसे किसी बच्चे में शेर का व्यवहार करने से की यह बच्चा शेर हैं ,शेर नाम के पशु के होने का निश्चय किया जाता हैं ,वैसे ही सूर्य आदि की गति में जो काल व्यवहार किया जाता हैं वह औपचारिक हैं ,अतः काल नाम का कोई स्वतंत्र द्रव्य होना आवश्यक हैं जिसका उपचार लौकिक व्यवहार में किया जाता हैं .
                 इस प्रकार जैन दर्शन में छह द्रव्य माने गए हैं .काल को छोड़कर शेष द्रवों को पंचास्तिकाय कहते हैं .अस्तिकाय में दो शब्द मिले हुए हैं एक अस्ति  और दूसरा काय .अस्ति शब्द का अर्थ हैं होता हैं जो की अस्तित्व सूचक हैं और काय शब्द का अर्थ होता हैं शरीर .अर्थात जैसे शरीर बहुदेशी होता हैं वैसे ही काल के सिवा शेष पांच द्रव्य भी बहुप्रदेशी हैं .इसलिए उन्हें अस्तिकाय कहते हैं .किन्तु काल द्रव्य अस्तिकाय नहीं हैं .क्योकि उसके कालाणु असंख्य होने पर भी परस्पर में सदा अबद्ध रहते हैं ,न तो वे आकाश के प्रदेशों की तरह सदा से मिले हुए एक और अखंड हैं और न पुद्गल परमाणुओं की तरह कभी मिलते और कभी बिछुड़ते ही हैं .इसलिए वे काय नहीं कहे जाते हैं .
                     प्रदेश के सम्बन्ध में भी कुछ मोटी बातें जान लेनी चाहिए.जितने देश को पुद्गल परमाणु रोकता हैं उतने देश को प्रदेश हैं .लोकाकाश में यदि क्रमवार एक -एक करके परमाणुओं को बराबर बराबर सटाकर रखा जाये तो असंख्यात परमाणु समा सकते हैं ,अतः लोकाकाश और उसमे व्याप्त धर्मऔर अधर्म द्रव्य असंख्यात प्रदेशी कहे जाते हैं ,इसी तरह शरीर परिमाण जीवद्रव्य भी यदि शरीर से बाहर फैले तो लोकाकाश में व्याप्त हो सकता हैं .अतः जीवद्रव्य भी असंख्यातप्रदेशी हैं .पुद्गल परमाणु तो एक ही प्रदेशी हैं ,किन्तु उन परमाणुओं के समूह से जो स्कंध बन  जाते हैं वे संख्यात  ,असंख्यात और अनंत प्रदेशी होते हैं .अतः पुद्गल द्रव्य भी बहुप्रदेशी हैं .इस तरह बहुप्रदेशी होने से पांच द्रव्यों को पंचास्तिकाय कहते हैं .
                             यहाँ इसबात का उल्लेख करना उचित होगा की अजीव द्रव्य हे भी हैं और उपादेय भी हैं जैसे ---
                        शरीर वांगमनःप्रानपानाः पुद्गलनाम .(तत्वार्थ सूत्र ५/१९)
                        शरीर ,वचन मन  और प्राणापान यह पुद्गलों का उपकार हैं . 
                             यह सूत्र जीवों के प्रति पुद्गलों के उपकार का कथन करने के लिए आया हैं .प्राण और अपानवायु भी आत्मा का उपकार करते हैं क्योकि इनसे आत्मा जीवित रहता हैं .ये मन ,प्राण और अपान मूर्त रूप हैं क्योकि दूसरे मूर्त पदार्थों के द्वारा इनका प्रतिघात आदि देखा जाता हैं .जैसे प्रतिभाय पैदा करने वाले बिजली पात आदि के द्वारा मन का प्रतिघात होता हैं और सूरा आदि के द्वारा अभिभव.तथा हस्ततल और वस्त्र आदि के द्वारा मुख ढँक लेने से प्राण और अपान का प्रतिघात होता हैं और कफ के द्वारा अभिभव .इसी प्रकार पारद यदि अशोधित हैं तो वह प्राणघातक हो जाता हैं और वह पारद शोधित हैं तो जीवन दायक हो जाता हैं .जैसे यंत्र प्रतिमा की चेष्टाएँ अपने प्रयोक्ता के अस्तित्व का ज्ञान कराती  हैं उसी प्रकार प्राण और अपान आदि रूप कार्य भी क्रिया वाले आत्मा के अस्तित्व के साधक हैं . 
                           सुखदुखः जीवित मरणोपग्रहाश्च .( तत्वार्थ सूत्र ५/२०) 
                           सुख, दुःख जीवन और मरण ये  भी पुद्गलों के उपकार हैं .
                          साता और असाता रूप अंतरंग हेतु के रहते हुए बाह्य द्रव्यादि के परिपाक के निम्मित से जो प्रीति और परिताप रूप परिणाम उतपन्न होते हैं वे ही सुख दुःख कहे जाते हैं .पर्याय के धारण करने में कारणभूत आयुकर्म के उदय से भवस्थिति को धारण करने वाले जीव के पूर्वोक्त प्राण और अपान रूप क्रिया विशेष का विच्छेद नहीं होना जीवित हैं और उसका उच्छेद मरण हैं .ये सुखादि जीव के पुद्गलकृत उपकार हैं ,क्योकि मूर्त कारणों के रहने पर ही इनकी उतपत्ति होती हैं .
                          इस प्रकार चिकित्सा क्षेत्र में भी अजीव द्रव्य औषधियां भी जीव के लिए लाभकारी होती हैं 
                   डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन, संरक्षक शाकाहार परिषद् A2 /104  पेसिफिक ब्लू, नियर डी मार्ट, होशंगाबाद रोड, भोपाल 462026  मोबाइल 09425006753


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