दिल्ली के राजनीति का शिखर थी शीला दीक्षित


 - ललित गर्ग -

सबसे लंबे समय तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रहने एवं दिल्ली को विश्व के आधुनिकतम शहरों की श्रृंखला में खड़ा करने की क्षमता देने के लिये शीला दीक्षित के योगदान दिल्ली के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में अंकित रहेंगे। उनका  81 वर्ष की उम्र में निधन न केवल राजनीतिक जगत की अपूरणीय क्षति है बल्कि दिल्ली की जनता के लिये उनकी व्यक्तिगत क्षति हैं। वे दिल्ली की जनता के दिलों में बसी थी, उनका दिल और द्वार दोनों ही हरदम जनता के लिये खुले रहते थे। 1998 से 2013 तक वे तीन बार दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं। इस दौर में दिल्ली में कई आधुनिक सुविधाओं में इजाफा हुआ। शीला दीक्षित को दिल्ली की तस्वीर एवं तकदीर  बदलने के लिए किए गए कार्यों के लिए हमेशा याद किया जाएगा। देश की राजधानी दिल्ली में ट्रैफिक सिस्टम सुधारने, प्रदूषण नियंत्रण और सांस्कृतिक-धार्मिक-सामाजिक मेल-मिलाप के लिए उनके काम हमेशा याद किए जाएंगे। यही कारण है कि उनकी पार्टी ही नहीं, बल्कि सभी राजनीतिक दलों ने उनके निधन को गहरा आघात माना। वे अजातशत्रु थी, दिल में रख लेने के काबिल थी, सदाबहार थी, उच्च जीवनमूल्यों की धारक थी। उन्होंने अपने चार दशक के राजनीतिक जीवन में तमाम राजनीतिक बुलंदियों को छुआ।

पिछले दिनों दिल्ली की प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में उनकी ताजपोशी से दिल्ली की जनता में उत्साह बना, वहीं लम्बे समय बाद दिल्ली कांग्रेस एकजुट भी नजर आई। वे कांग्रेस की कद्दावर की नेता थी। पार्टी की सीनियर लीडर थी, उनका लम्बा राजनीतिक अनुभव रहा। वे एक ऊर्जावान, युवाओं को प्रेरित करने वाली, कुशल नेतृत्व देने वाली और कुशल प्रशासक के रूप में दिल्ली प्रदेश की जननायिका थी। वे प्रभावी राजनायिका भी थी। लम्बी राजनैतिक यात्रा में तपी हुई दीक्षित अपनी सादगी एवं राजनीतिक जिजीविषा के कारण चर्चित रही हैं और उन्होंने सफलता के नये-नये कीर्तिमान स्थापित किये थे। सचमुच वे कार्यकर्ताओं की नेता थी और नेताओं में कार्यकर्ता। उनकी सादगी, विनम्रता, दीन दुखियारों की रहनुमाई और पार्टी के प्रति वफादारी ही उनकी पूंजी थी। दिल्ली में 15 सालों तक चली कांग्रेस सरकार ने जो काम किए, उसकी कोई मिसाल नहीं है। विकास के साथ उनका नाम जोड़कर देखा जाता है। अब उनके निधन से एक बड़ा सवाल खड़ा है कि दिल्ली कांग्रेस की कमान किसके हाथों में दी जाये?
शीला दीक्षित का दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष पद का दायित्व ग्रहण करना कांटोभरा ताज था, अनेक चुनौतियों के बीच उन्हें अपने-आपको साबित करने का मौका मिला था और उन्होंने साबित भी किया। पार्टी में नयी ऊर्जा एवं प्राणशक्ति  का संचार किया। इसमें संदेह नहीं कि शीला दीक्षित दिल्ली के मिजाज को बेहतर समझती थी, लेकिन इस बार हालात थोड़े अलग थे। आपने न सिर्फ दिल्ली के राजनीति वातावरण को त्रिकोणीय बना दिया था, बल्कि पिछले विधानसभा चुनावों में आप ने एकतरफा जीत हासिल कर सरकार भी चला रही है। उन चुनावों में कांग्रेस की दुर्गति किसी से छिपी नहीं है। ऐसे में परम्परागत प्रतिद्वंद्वी भाजपा के साथ ही आप से पार पाना कांग्रेस के लिए आसान नहीं था। कांग्रेस एवं आप दोनों ही दलों का मुख्य लक्ष्य दिल्ली में सत्ता से भाजपा को दूर रखना था। लेकिन आप से गठबंधन की बात शीला दीक्षित लगातार नकारती रही। इन जटिल हालातों से शीला दीक्षित को पार पाना सबसे बड़ी चुनौती था और इसमें उनकी क्षमता पर अधिक कुहासा कहीं भी नजर नहीं आ रहा था। वे दिल्ली कांग्रेस के लिये नयी संभावनाओं को लेकर आयी थी। बहुत लम्बे अर्से से कांग्रेस में फूट एवं द्वंद्व की स्थितियां बनी थी लेकिन शीलाजी के अध्यक्ष बनने के अवसर पर दिल्ली में कांग्रेस की एकजुटता की तस्वीर उभरना कार्यकर्ताओं में नये उत्साह का संचार किया। काफी समय से अपने-अपने इलाकों में सीमित रहें नेताओं ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर यह दर्शाने की कोशिश की कि वे शीला के साथ है और पार्टी को फिर से खड़ा करने को तत्पर हैं। यह शीलाजी के करिश्माई व्यक्तित्व एवं राजनीतिक अनुभव की ताकत ही थी।

शीला दीक्षित ने पहली बार दिल्ली कांग्रेस की कमान 1998 में तब संभाली थी, जब हालात ऐसे बन गए थे कि पार्टी को कई चुनावों में लगातार हार का मुंह देखना पड़ा था। पार्टी 1991, 1996, 1998 के लोकसभा और 1993 विधानसभा और 1997 के निकाय चुनाव हार चुकी थी। ऐसे में शीला दीक्षित ने फर्श पर पड़ी पार्टी को अर्श तक पहुंचाया और लगातार तीन बार दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं। इन्हें राजनीति में प्रशासन व संसदीय कार्यों का अच्छा अनुभव था। इन्होंने केन्द्रीय सरकार में 1986 से 1989 तक मंत्री पद भी ग्रहण किया था। पहले वे संसदीय कार्यों की राज्य मंत्री रहीं, तथा बाद में प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री रहीं। 1984 - 89 में इन्होंने उत्तर प्रदेश की कन्नौज लोकसभा संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया था। संसद सदस्य के कार्यकाल में, इन्होंने लोकसभा की एस्टीमेट्स समिति के साथ कार्य किया। इन्होंने भारतीय स्वतंत्रता की चालीसवीं वर्षगांठ की कार्यान्वयन समिति की अध्यक्षता भी की थी। दिल्ली प्रदेश कांग्रेस समिति की अध्यक्ष के पद पर, 1998 में कांग्रेस को दिल्ली में, अभूतपूर्व विजय दिलायी। 2008 में हुये विधानसभा चुनावों में शीला दीक्षित के नेतृत्व में कांग्रेस ने 70 में से 43 सीटें जीतीं। वे प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी, पूर्व राज्यपाल व केन्द्रीय मंत्रिमंडल में मंत्री रहे, श्री उमा शंकर दीक्षित के परिवार से जुड़ी हुई हैं। इनके पति स्व. श्री विनोद दीक्षित भारतीय प्रशासनिक सेवा के सदस्य रहे थे। उनके पास सुदीर्घ राजनीतिक अनुभव था। तड़क-भड़क से दूर मगर राजनीतिक समर्थकों की फौज से घिरे रहने वाली श्रीमती दीक्षित के बारे में कहा जाता है कि वे हर समय अपने कार्यकर्ताओं के लिए उपलब्ध रहती थीं। वे सरल एवं सादगी पसंद भी थी। मौलिक सोच एवं राजनीतिक जिजीविषा के कारण उन्होंने पार्टी के लिये संकटमोचन की भूमिका भी निभाई। वे राजनीति में उलझी चालों को सुलझाने के लिये कई दफा राजनीतिक जादू दिखाती रही हैं। उनकी जादुई चालों की ही देन है कि वे अनेक महत्वपूर्ण पदों पर आसीन रही हैं।
शीला दीक्षित अपनी राजनीतिक दक्षता एवं परिपक्वता के लिये लिये ही नहीं बल्कि अपनी विकासमूलक सोच एवं कार्यों के लिये भी याद आयेगी। वे हर पल कुछ नया और अनूठा करने को तत्पर रहती थी। दिल्ली की मुख्यमंत्री रहते हुए इस दौर में उन्होंने दिल्ली को आधुनिक सुविधाओं से सुज्जित किया। उनको दिल्ली की तस्वीर बदलने के लिए किए गए कार्यों के लिए हमेशा याद किया जाएगा। उनके कार्यकाल में दिल्ली में आधुनिक मेट्रो सेवा की शुरुआत हुई थी। 24 दिसंबर 2002 को शाहदरा-तीस हजारी के बीच दिल्ली की पहली मेट्रो सेवा चली थी। इसके बाद से दिल्ली में मेट्रो परिवहन का सबसे मॉडर्न और विस्तृत साधन बन चुकी है। दिल्ली के एक बड़े हिस्से तक मेट्रो की पहुंच उनके कार्यकाल में हुई। उन्होंने दिल्ली में सीएनजी यानी क्लीन एनर्जी की शुरुआत की गई थी। डीजल और पेट्रोल से चलने वाली गाड़ियों की जगह सीएनजी से चलने वाली बसें और ऑटो ने दिल्ली को क्लीन एनर्जी के रास्ते पर आगे बढ़ाया। 2009 में उन्होंने दिल्ली में लो-फ्लोर बसों की शुरुआत की। 2010 में उनकी सरकार ने दिल्ली में पहली बार सीएनजी हाइब्रिड बसों की शुरुआत की। प्रदूषण मुक्त बसों की ये सुविधा भारत के किसी शहर में पहली बार मिली थी।दिल्ली की अवैध कॉलोनियों में विकास के प्रस्ताव को पहली बार उन्होंने मंजूरी दी थी। लीक से हटकर शीला दीक्षित ने सरकारी फंड को अवैध कॉलोनियों में विकास के लिए खर्च करने की वैधानिक व्यवस्था की। इसके बाद से अवैध कॉलोनियों में रह रहे लोगों को भी नालियों-सीवर, पीने के पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं मुहैया हो सकीं।
दिल्ली को विकास की नयी उड़ान देने में शीला दीक्षित का योगदान अनूठा रहा। सड़कों और फ्लाईओवर्स का जाल बनाकर अपने शासनकाल में दिल्ली सरकार ने परिवहन और यातायात की सुविधाओं का विकास किया। शहर के बाहर से बाइपास निकालकर बाहर से आने वाली गाड़ियों को सुविधा दी तो इससे राजधानी दिल्ली में ट्रैफिक जाम की समस्या कम हुई। इसके बाद मुनिरका, आईजीआई एयरपोर्ट, अक्षरधाम, धौलाकुआं जैसी ज्यादा ट्रैफिक वाली जगहों पर फ्लाईओवर का जाल बनवाकर ट्रैफिक को रेगुलेट किया और लगातार जाम से दिल्ली की जनता को राहत पहुंचाई। शीला दीक्षित मुख्यमंत्री थीं और तब केंद्र में बीजेपी की अटल सरकार थी। उन्होंने अपनी सूझबूझ एवं दूरदर्शिता से केन्द्र सरकार से बेहतर सामंजस्य स्थापित कर मेट्रो, हाईवे, बिजली समेत तमाम ऐसे प्रोजेक्ट पास कराए जिससे दिल्लीवालों की जिंदगी में बड़े बदलाव आए। इन कामों के लिए शीला दीक्षित को हमेशा याद रखा जाएगा। शीला दीक्षित के काम आज इसलिये भी ज्यादा याद आते हैं कि केजरीवाल एवं आप सरकार ने उनका बिलकुल अनुसरण नहीं किया, बल्कि सारे विकास कार्यों को अवरूद्ध कर दिया।
दिल्ली में  2010 में राष्ट्रमंडल खेलों का सफल, नियोजित आयोजन कर शीला दीक्षित की सरकार ने दिल्ली शहर की क्षमताओं को एकाएक आकार देकर दुनिया को दिखाया कि भारत किसी भी स्थिति में कमजोर नहीं है। 50 से अधिक देशों की टीमें दिल्ली आईं। दिल्ली में बने मॉडर्न खेल गांव और स्टेडियमों में बेहतरीन सुविधाएं विकसित कर शीला दीक्षित की सरकार ने देश का गौरव बढ़ाया और आधुनिक हो रहे भारत की ताकत का एहसास कराया। ग्रीन दिल्ली कैंपेन के तहत दिल्ली के कई इलाकों में शीला सरकार ने पर्यावरण प्रदूषण कम करने के लिए पहल की। सड़कों के किनारे लाखों पेड़-पौधे लगाए गए। दिल्लीवालों को 24 घंटे बिजली की सुविधा मिलनी शुरू हुई। कई पावर प्लांट लगाए गए इसके अलावा सरप्लस बिजली वाले राज्यों से समझौते कर शीला दीक्षित की सरकार ने दिल्ली में 24 घंटे बिजली आपूर्ति सुनिश्चित की। बात केवल आधुनिक संसाधनों को विकसित करने की ही नहीं है, बल्कि उनकी दृष्टि शिक्षा एवं स्वास्थ्य जैसी मूलभूत जरूरतों पर भी लगी रहती थी। वे स्वयं व्यक्तिगत रूचि लेकर दिल्ली के लोगों का समुचित विकास करने को तत्पर रहती थी। वे सामाजिक एवं धार्मिक कार्यक्रमों में अपनी तमाम व्यस्तताओं के बावजूद जरूरी हिस्सेदारी करती थी। मैंने अणुव्रत आन्दोलन के अनेक कार्यक्रमों में उन्हें आमंत्रित किया और वे बड़ी सहजता से इनमें शामिल होती रही। उन्होंने आचार्य महाप्रज्ञ की जीवन विज्ञान परियोजना को दिल्ली की शिक्षा पद्धति में लागू किया।
शीला दीक्षित की बड़ी उपलब्धियांे की यो तो लम्बी लिस्ट हैं, लेकिन प्रमुख हैं मेट्रो, सीएनजी, दिल्ली की हरियाली, स्कूलों में नैतिक शिक्षा को बदल देना, यातायात व्यवस्था सुगम बनाना, बिजली की 24 घंटों आपूर्ति और अस्पतालों के लिए काम करना। उन्होंने पहली बार लड़कियों को स्कूल में सेनेटरी नैपकिन बंटवाए। उन्होंने दिल्ली में कई विश्वविद्यालय बनवाए और ट्रिपल आईआईटी भी खोली।
यही कारण है कि राहुल गांधी ने पार्टी की पुरानी और अनुभवी नेता शीला दीक्षित को दिल्ली प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाकर पार्टी के भीतर ऐसी परिवर्तन की बड़ी प्रतिध्वनि की थी, जिसके दूरगामी परिणाम प्रदेश पार्टी को नया जीवन एवं नई ऊर्जा देने वाले साबित होने लगे थे। जिसने न सिर्फ कांग्रेस पार्टी के वातावरण की फिजां को बदला था, अपितु राहुल गांधी के प्रति आमजनता के चिन्तन के फलसफे को भी बदल दिया था। भाजपा के कांग्रेस मुक्त भारत के नारे बीच कांग्रेस की दिनोंदिन जनमत पर ढ़ीली होती पकड़ एवं पार्टी के भीतर भी निराशा के कोहरे को हटाने के लिये ऐसे ही बड़े परिवर्तनों की आवश्यकता महसूस की जाती रही थी, जिसे शीलाजी की सक्रियता से नया जीवन मिला। सर्वविदित है कि नरेन्द्र मोदी ने कांग्रेस के एकछत्र साम्राज्य को ध्वस्त किया है। इस साम्राज्य का पुनर्निर्माण राहुल गांधी के सम्मुख सबसे बड़ी चुनौती बनी। शीला दीक्षित को दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप नियुक्ति देकर उन्होंने इस चुनौती की धार को कम करने की दिशा में चरणन्यास किया था। पिछले लम्बे दौर से पार्टी सबसे गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही थी, इसलिए इसका जवाब भी उतने ही मजबूत संकल्प के साथ दिया जाना जरूरी हो गया था। कांग्रेस पार्टी को अपनी खोयी प्रतिष्ठा दिलाने में शीलाजी से बहुत अपेक्षाएं एवं उम्मीदें थी, जो उनके निधन से एक बार फिर धुंधला गयी है।
प्रेषकः


(ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133


 

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