सुखी वैवाहिक-दाम्पत्य जीवन का ज्योतिषीय कारण

सुखी वैवाहिक-दाम्पत्य जीवन का ज्योतिषीय कारण
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पंडित रामकिशोर वैदिक भोपाल



विवाह एक जाटिल संस्था है| जब मान, मुल्य, धामिक आस्था व परपराऐ बिखरने लगें तथा स्वाथॅ, सता लोभ को प्राथमिकता मिले वहां विवाह पर कुछ भी कहना मानों शत्रुता मोल लेना है| एक बार अमेरिका में किसी न्यायधीश ने कहा था विवाह अनुबंध अन्य किसी भी प्रकार के अनुबंध से भिन्न है। यदि कोई व्यापारीक गठबंधन टुटता है तो मात्र संबंधित दो दलों पर ही इसका प्रभाव पड़ता है। इसके विपरीत विवाह विच्छेद मात्र दो व्यक्तियो को ही नहीं अपितु परिवार व समाज को झकझोर कर रख देता हैं। बिखरे परिवार के बच्चे असुरक्षा की भावना में पलते व बढ़ते है तो कभीं समाज विरोधी कायौ मे समलित हो जाते है। इस प्रकार देश व समाज की खुशहाली में बाधा पड़तीं है।


1. विवाह गृहस्थ जीवन का प्रवेश द्वारा है| देश व समाज का भविष्य को सजने संवारने की विधा है। पति-पत्नी का परस्पर प्रगाढ प्रेम बच्चों मे स्नेह, संवेदना परस्पर सहयोग व सहायता के गुणो को पुब्ट करता है। भावी पीढ़ी में सहजता सजगता व सच्चाई देश के भविष्य को उज्ज्वल बनती है। वैवाहिक जीवन में सभी प्रकार के तनाव व दबाव सहने की क्षमता का आंकलन करने के लिए भारत में कुंडली मिलान विधा का प्रयोग शताब्दीयो से प्रचलित है।


( 2 ) यदि सप्तम भाव हीनबली है तो उसका मिलान ऐसी कुंड़ली से जो उस अशुभता का प्रतिकार कर सके। उदाहरण के लिए मंगलीक कन्या के लिए मंगलिक वर का ही चयन करें। कुंड़लियो का बल परास्पर आकषर्ण देह व मन की समता जानकर किए गए विवाह दामपत्य खुख व स्थायित्व को बढाते हैं।


उदृाहरण👉 के लिए यदि वर या कन्या की कुंड़ली में शुक्र अथवा मंगल सप्तमस्थ है तो इसे यौन उत्तेजना व उदात संवेगों का कारक जानें। वहां दूसरी कुंड़ली के सप्तम भाव में मंगल या शुक्र की उपस्थिति एक अनिवार्य शर्त बन जाती है। यदि असावधानी वश सप्तमस्थ बुध या गुरु वाले जातक से विवाह हो जाए तो यौन जीवन में असंतोष परिवार में कलह, कलेश व तनाव को जन्म देता है। इतिहास ऐसें जातकों से भरा पड़ा है जहां अनमेल विवाह के कारण परिवारिक जीवन नरक सरीखा होगा।


3. लग्न में मिथुन, कन्या, धनु और मीन राशि होने पर जातक विवाहेतर प्रणय संबंधो की और उन्मुख होता है। कारण उस अवस्था में सप्तम भाव बाधा स्थान होता हैं। अतः यौन जीवन में असंतोष बना रहता है। यदि दशम भाव का संबंध गुरु से हो तो जातक दुराचार मे संलिप्त नहीं होता।
काम सुख के लिए अभिमान,अंहता यदि विष तो दैन्यता, विनम्रता, सेवा सहयोग की भावना, रुग्ण दंपत्य को सवस्थ व निरोग बनाने की अमृत औषधी है।
मधुर गृहस्थ जीवन कैसे बनाएँ यह प्रत्येक गृहस्थी के लियें ज्योतिषीय द्ष्टि से चितन करना अवश्यक हैं। गृहस्थ जीवन काम-वासना या स्वेच्छाचारिता के लिए नहीं हुआ करता यह एक पवित्र बंधन होता है जिसमें आत्मवंश की वल्ली को निरन्तर बनाने के साथ-साथ लौकिक एंवं पारपौकिक सुख की कामना छिपी रहती हैं। विवाह से पूर्व प्रायः जीवन साथी बचपन से विवाह तक अलग-अलग परिवार के सदस्य होते हैं और बच्चपन के संस्कार प्रायः स्थाई भाव जमाएं रहते हैं, ये संस्कार और स्थाई भाव समय के साथ बदल नहीं पाते और गृहस्थी को नारकीय या स्वर्णिम बना देते है।
ज्योतिषिय गृह योगों के अधार पर एक दुसरे की अपेक्षाओं को समझकर चला जाय तो गृहस्थ जीवन मधुर बना रहता है।
गृहस्थ जीवन के वैसे तो कईं भाग महत्वपूर्ण होते है लेकिन अभिव्यक्ति एंव चितन ही सबसे महत्वपूर्ण होते है छोटी-छोटी बातों पर आशंका करना या अंतर्मन में कुछ और होते हुएं वाणी से कुछ का कुछ कह देना दामपत्य जीवन में बिगाड़ ला देता हैं।


यहां पर कुछ ज्योतिषीय योग द्वारा सरल शब्दों में उदाहरण दिया जाए रहा है।


 1. दादश भाव में धनु या वृश्चिक का राहु हो, चन्द्र शनिदेव सप्तम, दितीय, लग्न या नवम में हो तो एक दूसरे के प्रति भ्रांतियां, आशंकाएं तथा आत्मभय पैदा करवा देतें हैं।


2. नीच के गुरु, चन्द्र मीन में बुध-शनि भी अनावश्यक प्रंसगो में आंशकाए खडीं करवा देता है यह योग स्त्री कि कुंडली में हो तीव्रतर प्रभाव डालता हैं।


3. तीसरे एवं पाचवें भाव का अधिपति सूर्य शनि मंगल में से कोई भी हो तथा नीचस्थ होकर गुरु से संबध कर रहें हो तो अपने ही परिजनो के यवहार में दोहरापन रहने से गृहस्थ जीवन में आशांति हो जाती है।


4 . दुसरे तीसरे स्थान पर नीचस्थ ग्रहो का बैठना अप्रिय भाषण का कारण होता है लेकिन सूर्य वास्तविकता को उजागार करवाता हैं चन्द्रमा चंचलता पैदा करवाकर कुत्रिम व्यवहार करवा देता है जिसकी पोल कुछ समय में ही खुल जाती है और स्वंय को लज्जित भी करवा देती हैं।


5.सत्तमेश, लग्नेश का नीचस्थ शुक्र से संबंध बना हो या स्वंय शुक्र ही इनका स्वामी हो और नवमांश में हीनाश मंगल के साथ संबंध कर रहा हो तो अंतरंग संबधों को लेकर शीतयुद्ध चलता रहता है तथा इन्ही की महादशा एंव अन्तरदशा आ जाय तब भंयकर विस्फोट की आंशका बन जाती है। ऐसी स्थती में पुरुष के ग्रह हो तो स्त्री को वयर्थ भातिंयो से बचना चाहिए ऐसी स्थती में सोमवार को भगवान शिव का अभिषेक करना चाहिएं।


6. मंगल-चन्द्रमा कर्क राशि में एक साथ हो तो दोहरी बातें करने के कारण गृहस्थ जीवन में निराधार आशंकाए खड़ी हो जाती हैं।


7. मीन राशि में बुध के साथ शनि या केतु दुसरे,तीसरे भाव में हो आधी बात छोड़कर रहस्य बनायें रखने कि आदत हो जाती है।


8. गुरु – शुक्र मकर राशि में हो तो दोहरी वार्ताओ में दक्ष बनाता है तथा रहस्यवादी होकर भी बहुत व्यवहारिक व्यक्तित्व दिखाईं देता है जबकि आंतरिक रुप से स्वार्थ पराकाष्ठा होती है पुरुष के योग तो संकारात्मक परिणामकारी होते है। लेकिन स्त्री वर्ग को असुरक्षा सी महसुस करवाता है।


9.  दुसरें भाव में पापगृह हो तथा बारहवें भाव में शुभ गृह हो या देखते हो तो जीवन साथी को समझने में भूल करवा देता हैं।


10. चतुर्थ भाव में शुक्र या चंन्द्रमा नीच राशि का हो तो घर का सुख की क्षति करते है।


11. व्यय भाव में वृषभ का शनि बकि् हो अब्टम भाव में चंन्द्र,राहु हो गोचर का शनि जब भी मेषराशि पर भ्रमण करेगा उस समय गृह कलह लड़ाई झगड़े.दुर्घटना आदि के योग बनतें है।
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